रोजगार पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के 68वें चरण में यह अनुमान लगाया गया है कि लगभग 48.9 प्रतिशत कामगारों की आजीविका का मुख्य साधन कृषि ही है। साथ ही, हमारी 70 प्रतिशत जनसंख्या (2011 की जनगणना) ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है जिसकी आय वृद्धि सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन सबसे अधिक ग्रामीण रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र में आय बढ़ाने के लिए मूल्य-आधारित वृद्धि की रणनीति लम्बे समय तक नहीं चल सकती, इसलिए शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों में कलस्टर- पद्धति पर कृषि औद्योगीकरण ही इकलौता रास्ता है। इससे कृषि में आय का वह पक्ष भी दुरुस्त हो जाता है, जो 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद सभी कृषि नीतियों और प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर पहुँच गया है। सौभाग्य से, हमारा देश भूख खत्म करने एवं सभी को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने के एजेंडा पर बहुत आगे बढ़ चुका है क्योंकि 1950-51 से अभी तक विभिन्न खाद्य सामग्री में 2.78 से 47.57 गुना इजाफा हो चुका है। यह भारतीय कृषि की एक और विशेषता है क्योंकि जिंसो का बेचने योग्य, अधिशेष (अतिरिक्त मात्रा) बढ़ता जा रहा है, जिस कारण कटाई के बाद उत्पादों के प्रबंधन एवं प्रसंस्करण की मांग उठ रही है ताकि जिंसो को लम्बे समय तक सुरक्षित रखा जा सके और उपयुक्त समय एवं रूप में बाजार में उतारकर सबसे अच्छी व सही, मगर बढ़िया कीमत हासिल की जा सके। दिलचस्प है कि रोजमर्रा की खाद्य सामग्री के मुकाबले अधिक मूल्य प्रदान करने वाली जिंसों के उत्पादन में अधिक तेजी से वृद्धि हो रही है। पोषण सुरक्षा की दृष्टि से यह सबसे संतोषजनक बात है, लेकिन इससे कृषि-आधारित उद्योगों के सामने उस अतिरिक्त उत्पादन के इस्तेमाल की चुनौती खड़ी हो जाती है, जिसे ताजा या कच्चा नहीं खाया जा सकता। इसलिए अब हमें पुराना नजरिया बदलना होगा, जिसमें कृषि और उद्योगों को उनकी प्रकृति तथा अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका के लिहाज से बिल्कुल अलग क्षेत्र माना जाता था और वह नजरिया इसलिए बदलना होगा क्योंकि अब कृषि के बजाय कृषि-आधारित उद्योगों में वृद्धि हो रही है। शायद इस पर बड़ी बहस की जरूरत है क्योंकि उत्पादन तथा प्रसंस्करण के पहले चरण में फर्क करना आसान है मगर उसके बाद इनमें अन्तर करना मुश्किल हो जाता है। कृषि प्रसंस्करण उद्योगों के विकास को कृषि का औद्योगीकरण और ऐसी संयुक्त प्रक्रिया मानना चाहिए, जिससे नया औद्योगिक क्षेत्र तैयार हो रहा है। हालांकि उद्योग और कृषि-आधारित उद्योगों के बीच स्पष्ट अन्तर करना वास्तव में मुश्किल है, लेकिन अकाल जांच आयोग (भारत), 1944 द्वारा की गई परिभाषा इस मामले में उपयुक्त है। आयोग ने कृषि-आधारित उद्योगों के बारे में कहा, ‘ऐसे उद्योग, जो खेतों को कृषि सामग्री प्रदान करने के साथ ही खेतों के उत्पादों का प्रबंधन भी कर रहे हैं, उन्हें कृषि-आधारित उद्योग कहा जा सकता है।’ अन्तरराष्ट्रीय मानक औद्योगिक वर्गीकरण (आईएसआईसी) में खाद्य, पेय एवं तम्बाकू, वस्त्र परिधान के विनिर्माण, चमड़ा उद्योग, काष्ठ एवं काष्ठ उत्पाद, कागज एवं कागज उत्पादों के विनिर्माण मुद्रण एवं प्रकाशन, रबर उत्पादों के विनिर्माण को कृषि-औद्योगिक उत्पादन के अन्तर्गत रखा गया है।
आय एवं रोजगार सृजन
ऐसे वर्गीकरण से यह विश्वास जगता है कि देश के सुदूर क्षेत्रों में प्रमुख रोजगार-प्रदाता बनचुके कृषि एवं कृषि-आधारित उद्योगों (कृषि प्रसंस्करण, वस्त्र, चीनी एवं अन्य सम्बन्धित गतिविधियां) को मौजूदा सन्दर्भ में और ग्रामीण भारत में आय के स्रोतों में विविधता लाने के उद्देश्य से प्राथमिकता तय करने में अहम भूमिका निभानी हैक्योंकि कृषक परिवारों की कुल आय में खेती और पशुपालन का योगदान केवल 35 प्रतिशत रह गया है (तालिका-2) जबकि उनकी औसत मासिक आय में मजदूरी और सेवा का 50 प्रतिशत से अधिक योगदान है।
वर्ष 2014-15 की आर्थिक समीक्षा में खाद्य महंगाई के उच्च-स्तर प्याज, टमाटर और आलू जैसी कुछ जिंसों की कीमतों में कुछ समय के लिए अचानक आने वाले तेज उछाल के खतरों से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र में गहरे परिवर्तन पर जोर दिया गया क्योंकि इस तरह की महंगाई अब लम्बे समय तक टिकी रहती है, जिससे आर्थिक अस्थिरता भी आ रही है। समीक्षा में कम संसाधनों में अधिक फल प्राप्त करने के लिए कृषि के प्रति दृष्टिकोण में नया प्रतिमान जोड़ने की सिफारिश की गई थी। यदि कृषि-आधारित खाद्य एवं गैर-खाद्य गतिविधियों में अधिक अवसर मुहैया कराए जाए तो ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ सकती है। वार्षिक औद्योगिक सर्वेक्षण 2016-17 दिखाता है कि औद्योगिक रोजगार में कृषि उद्योगों का लगभग 36 प्रतिशत योगदान है (तालिका 3)। इसके अलावा, कृषि उत्पादन एवं आपूर्ति श्रृंखला में अच्छी-खासी रोजगार सृजन क्षमता है। इन विशेषताओं से संकेत मिलता है कि इन कृषि व्यापारों को विकास एवं रोजगार की राष्ट्रीय रणनीति में प्राथमिकता मिलनी ही चाहिए।
वर्ष 2016-17 के केन्द्रीय बजट में कृषि एवं गैर-कृषि क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं को नए सिरे से दिशा देते हुए कृषि पर विशेष जोर दिया गया था ताकि सिंचाई के लिए नया बुनियादी ढांचा बनाकर, मूल्यवर्धन कर तथा खेत से बाजारों तक सम्पर्क प्रदान कर किसानों की आय 2022 तक दोगुनी की जा सके।
कृषि खाद्य उद्योगों में उत्पादन गतिविधियों में, प्रत्यक्ष भारी रोजगार सृजन करने और इससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में परोक्ष रोजगार सृजन करने की क्षमता है। यह रोजगार ग्रामीण क्षेत्रों में होगा, जहाँ उद्योगों को कच्चे माल विशेषकर जल्द खराब होने वाले कृषि उत्पादों के स्रोत के निकट लगाना होगा। ये उद्योग कटाई के बाद होने वाला नुकसान कम करने में और सह-उत्पादों का अधिक प्रभावी तौर पर इस्तेमाल करने में मदद करेंगे। इससे किसानों को बेहतर दाम मिलने के कारण ग्रामीण आय में इजाफा हो सकता है और कृषि उपभोक्ता वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ने से उपभोक्ताओं की भलाई भी हो सकती है। हमारे देश में उपलब्ध प्रचुर सम्भावना का- (अ) उत्पादन के उचित-स्तर एवं प्रौद्योगिकी के चयन; (आ) मौजूदा इकाइयों की प्रौद्योगिकी के उन्नयन; (इ) उत्पादों तथा देश-विदेश में मौजूद उपभोक्ताओं के बीच उचित कड़ी की स्थापना और (ई) उचित संस्थागत व्यवस्था की स्थापना के जरिए पर्याप्त दोहन किया जा सकता है।
इस उद्योग की वृद्धि में सबसे बड़ी बाधा इसका छोटा परिमाण या स्तर रहा है और इसी कारण अधिकतर भारतीय किसान उच्च-मूल्य वाली कृषि को भी नहीं चुन पाते। सड़क, बिजली और संचार जैसे बुनियादी ढांचे में निवेश से कृषि व्यापार की लागत कम होगी और निजी क्षेत्र भी कृषि प्रसंस्करण, कोल्ड-स्टोरेज संयंत्रो, रेफ्रिजरेटेड आवागमन और रिटेल श्रृंखला में निवेश के लिए प्रोत्साहित होगा। ठेके पर खेती, उत्पादक संगठन और सहकारी संस्थाओं जैसी जिन व्यवस्थाओं से किसान आसानी से बाजार पहुँच सकते हैं, कीमत का जोखिम बंट जाता है और मार्केटिंग तथा लेन-देन की लागत कम हो जाती है, उच्च मूल्य वाली कृषि को आगे बढ़ाने में बहुत कारगर साबित हो सकती हैं।
खाद्य प्रसंस्करण उद्योग रोजगार की प्रचुरता वाला क्षेत्र है, जिसने 2012-13 में सभी पंजीकृत कारखानों से सृजित कुल रोजगार में 11.69 प्रतिशत योगदान किया। शहरी और ग्रामीण भारतीय परिवारों में सबसे अधिक खर्च भोजन पर ही होता है। शहरी परिवार द्वारा खपत पर होने वाले कुल खर्च भोजन पर ही होता है। शहरी परिवार द्वारा खपत पर होने वाले कुल खर्च में 39 प्रतिशत और ग्रामीण परिवार द्वारा खपत में 49 प्रतिशत हिस्सा भोजन का ही है। कृषि, पशु और वनोत्पादों का कच्चे माल के तौर पर इस्तेमाल कर, होने वाली तमाम गतिविधियां खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में ही आती हैं। कृषि पर आधारित कुछ पारम्परिक उद्योग पहले से हैं, जैसे चावल और आटे की मिलें चीनी, खांडसारी तथा गुड़ की इकाइयां, खाद्य तेल मिल तथा चाय, कॉफी एवं काजू जैसी फसलो के प्रसंस्करण की इकाइयां। कुछ आधुनिक खाद्य-प्रसंस्करण उद्योग भी हैं जैसे डेयरी उत्पाद, कनफेक्शनरी, समुद्री उत्पाद, बागवानी उत्पाद एवं सब्जियां, मांस एवं पोल्ट्री उत्पाद। साथ ही, कृषि अवशेषों और मुख्य कृषि-आधारित उद्योगों के सह-उत्पादों का प्रसंस्करण भी एक सीमा तक किया जाता है। इतनी अधिक गतिविधियों के कारण विभिन्न कृषि खाद्य उद्योगों की समस्याओं की प्रकृति भी बहुत अलग है। इसलिए विभिन्न कृषि खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को समेटने वाले प्रौद्योगिकी नीति ढांचे की कल्पना ही करना कठिन है। उनमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालने और ग्रामीण जनसंख्या की आय बेहतर करने की क्षमता है। हालांकि प्रसंस्करण से कच्चे उत्पाद की बुनियादी विशेषताएं बदल जाना तय है, लेकिन खाद्य प्रसंस्करण गतिविधियों से जुड़ी नीतियां भी प्रसंस्करण के उद्देश्य के आधार पर अलग-अलग गतिविधियों के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। कुछ प्रसंस्करण जरूरी हो सकते हैं, जिन्हें खपत से पहले करना ही होता है। अनाज का क्षेत्र प्रसंस्करण की इसी श्रेणी में आता है। ऐसा प्रसंस्करण देश में पहले ही किया जा ररहा है, लेकिन इस क्षेत्र में आधुनिक तकनीकों का प्रवेश दो प्रकार से लाभकारी माना जा रहा है। पहले तो इससे प्रसंस्करण की क्षमता बढ़ेगी और वांछित उत्पाद अधिक मात्रा में मिलने लगेंगे। दूसरी बात, इससे बड़ी संख्या में उपयोगी सह-उत्पाद उत्पन्न होंगे, जिनमें से कुछ का अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं होता या उच्च मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने में समुचित उपयोग नहीं होता। हालांकि अधिकतर प्रौद्योगिकी देश में पहले से ही उपलब्ध हैं, लेकिन इसे व्यापक स्तर पर अपनाया नहीं जा रहा क्योंकि अक्सर आर्थिक प्रोत्साहन ही नहीं होते या सह-उत्पादों के संग्रह, प्रसंस्करण एवं मार्केटिंग के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं ही नहीं होती। चूंकि खाद्यान्न क्षेत्र में सह-उत्पादों के प्रसंस्करण से नई विनिर्माण गतिविधियां आरम्भ होती हैं या मौजूदा गतिविधियों में विस्तार होता है। इसीलिए ऐसी गतिविधियां अतिरिक्त रोजगार सृजित करती हैं। भारत के खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में करीब 65 लाख लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार मिला है।
