- शलजम की एशियन या उष्णकटिबंधीय किस्में- पूसा स्वेती, पूसा कंचन, व्हाईट 4, रेड 4, शलजम एल- 1 और पंजाब सफेद आदि और यूरोपियन शीतोष्ण किस्में- गोल्डन, पर्पिल टाइप व्हाईट ग्लोब, स्नोबल, पूसा चन्द्रमा, पूसा स्वर्णिम, आदि प्रमुख है|
- इस फसल के लिए 3 से 4 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है| इसके उपचार के लिए 3 ग्राम बाविस्टिन या कैप्टान से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करना चाहिए|
- इसकी बुवाई का समय सितंबर से अक्तूबर और पहाड़ी क्षेत्रों के लिए जुलाई से अक्तूबर उपयुक्त रहता है| इसकी बुवाई में लाइन से लाइन की दुरी 30 से 40 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दुरी 10 से 15 सेंटीमीटर और गहराई 2 से 3 सेंटीमीटर रखनी चाहिए|
सिंचाई और खरपतवार प्रबंधन - शलजम की बुवाई के 8 से 10 दिन बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए| बाद में आवश्यकतानुसार 10 से 15 दिन के बाद सिंचाई करते रहना चाहिए|
- इस फसल में 2 से 3 निराई गुड़ाई की आवश्यकता होती है| यदि खेत में ज्यादा खरपतवार होती है तो बुवाई के बाद 2 दिन तक पेंडीमेथलिन 3 लीटर को 800 से 900 लिटर पानी मे मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए|
रोग और कीट रोकथाम
- इस फसल में पिला रोग, अंगमारी और फफूंदी जैसे रोग लगते है| इनकी रोकथाम के लिए रोगरोधी किस्मों का चुनाव करना चाहिए और बीज को उपचारित कर कर बोना चाहिए| रोगी पौधों को उखाड़ कर मिट्टी में दबा देना चाहिए| इसके साथ साथ डाइथेन एम 45 या जेड 78 का 0.2 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए|
- शलजम (Turnip) की फसल में माहू, मुंगी, बालदार कीड़ा, सुंडी और मक्खी जैसे किट लगते है| इनकी रोकथाम के लिए मैलाथियान 1 लीटर का 700 से 800 लिटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए| इसके साथ साथ एंडोसल्फान 1.5 लीटर इतने ही पानी में मिलाकर प्रति हेक्टेयर छिड़काव करना चाहिए|
फसल कटाई और पैदावार
- शलजम की खुदाई जब इसकी जड़े खाने योग्य हो जाए तभी से खुदाई शुरू कर देनी चाहिए|
- उपरोक्त विधि से खेती करने के पश्चात इसकी पैदावार 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए|
