बीन्स की खेती कैसे करें
बीन्स की खेती के लिए समशीतोष्ण और उष्णकटिबंधीय जलवायु उपयुक्त होती है. भारत के लगभग हर प्रदेशों में इसे उगाया जा सकता है. इसकी खेती के लिए अधिक बारिश की भी जरूरत नही होती. इसके लतादार पौधों को बढ़ने के लिए सहारे की जरूरत होती है. मध्य और दक्षिण भारत में इसकी खेती अधिक होती है. भारत में इसकी खेती मुख्य रूप से रबी की फसल के साथ की जाती है. वर्तमान में इसकी पैदावार कर किसान भाई अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं.
अगर आप भी इसकी खेती करने का मन बना रहे हैं तो आज हम आपको इसकी खेती के बारें में सम्पूर्ण जानकारी देने वाले हैं.
उपयुक्त मिट्टी
बीन्स की खेती के लिए उचित जल निकासी वाली उपजाऊ भूमि की जरूरत होती है. लेकिन अधिक पैदावार लेने के लिए इसे काली चिकनी मिट्टी में उगाना चाहिए. इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच. मान 5.5 से 6.5 के बीच होना चाहिए.
जलवायु और तापमान
बीन्स की खेती के लिए जलवायु और तापमान मुख्य कारक के रूप में काम करते हैं. इसकी खेती के लिए समशीतोष्ण जलवायु उपयुक्त होती है. इसके पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए ठंड की जरूरत होती है. और सर्दियों में पड़ने वाले पाले को इसके पौधे सहन कर सकते हैं. लेकिन पाला अधिक टाइम तक ज्यादा मात्रा में गिरता है तो इसकी पैदावार प्रभावित होती है. अधिक गर्मी इसके पौधे के लिए उपयुक्त नही होती. और इसके पौधे को बारिश की भी ज्यादा जरूरत नही होती.
इसकी खेती के लिए 15 से 25 डिग्री तक तापमान उपयुक्त होता है. इसके बीजों को अंकुरित होने के लिए शुरुआत में 20 डिग्री के आसपास तापमान की जरूरत होती है. गर्मियों में इसका पौधा 30 डिग्री तापमान पर आसानी से विकास कर लेता है. लेकिन इससे ज्यादा तापमान होने पर पौधे की फलियों में बीज नही बनते और इसके फूल गिरने लगते हैं.
उन्नत किस्में
बीन्स की कई तरह की किस्में मौजूद हैं. जिन्हें उनकी पैदावार, आदर्श वातावरण और पौधों के आधार पर अलग अलग प्रजातियों में बाँटा गया है.
झाड़ीदार किस्में
इस तरह के पौधे झाडी के रूप में उगते हैं. जिनको ज्यादातर पर्वतीय भागों में उगाया जाता है.
स्वर्ण प्रिया
इस किस्म के पौधों पर पाई जाने वाली फली सीधी, लम्बी, चपटी और मुलायम रेशेरहित होती है. जिनका रंग हरा दिखाई देता है. इसके पौधे बीज रोपाई के लगभग 50 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 11 टन के आसपास पाया जाता है.
अर्का संपूर्णा
इस किस्म का निर्माण भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा किया गया है. इस किस्म के पौधों पर रतुआ और चूर्णिल फफूंद का रोग नही लगता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग 50 से 60 दिन बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर कुल उत्पादन 8 से 10 टन के आसपास पाया जाता है.
आर्क समृद्धि
इस किस्म का निर्माण भी भारतीय बागवानी अनुसंधान संस्थान, बैंगलोर द्वारा किया गया है. इस किस्म की फलियों का रंग हरा होता है. जो गोल, लम्बी, और मोटे छिलके वाली होती है. इसके फलों की गुणवत्ता अच्छी होती है. जिनका प्रति हेक्टेयर कुल उत्पादन 19 टन तक पाया जाता है.
बेलदार किस्मे
बेलदार किस्मों के पौधे बेल के रूप में बढ़ते हैं. जिनकी खेती ज्यादातर मैदानी भागों में की जाती है.
स्वर्ण लता
इस किस्म के पौधों पर लगने वाली फलियां लम्बी, मोटी और गूदेदार होती है. जिनका रंग हरा दिखाई देता है. इस किस्म के पौधे रोपाई के लगभग दो महीने बाद पैदावार देना शुरू कर देते हैं. जिनका प्रति हेक्टेयर उत्पादन 12 से 14 टन के बीच पाया जाता हैं.
अर्का कृष्णा
इस किस्म को अगेती फसल के रूप में उगाया जाता है. जिसके पौधे तेज़ सूर्य के प्रकाश को सहन नही कर पाते. इसके पौधे पर फल गुच्छों में लगते हैं. जिनका रंग गहरा हरा दिखाई देता है. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 टन तक पाया जाता हैं.
अर्का प्रसिद्धि
इस किस्म के ज्यादातर खेती दक्षिण भारत में की जाती है. जिसके पौधे पर लगने वाली फली लम्बी, चपटी और मुड़ी हुई होती हैं. जिनका रंग गहरा हरा होता है. इस किस्म के पौधे पर गेरुए रोग का प्रभाव देखने को नही मिलता. इस किस्म का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 30 टन से भी ज्यादा पाया जाता है.
