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आम की खेती की तकनीकी अपेक्षाएं

Posted on December 11, 2020 By User No Comments on आम की खेती की तकनीकी अपेक्षाएं

भूमिका

आम भारत का मुख्य फल–फसल है और उसे फलों का राजा माना जाता है। रूचिर स्वाद, अच्छी महक, आकर्षक सुगंध के अलावा, इसमें विटामिन ‘ए’ व ‘सी’ काफी अधिक मात्रा में होता हैं। आम का पेड़ स्वभावतः कड़ा होता है, भिन्न-भिन्न तरह की मिट्टी में उसे उगाया जा सकता है और इसके रख रखाव पर अपेक्षित लागत तुलनात्मक रूप में कम आती है। आम के फल का उपयोग, उसकी परिपक्व और अपरिपक्व दोनों आवस्थाओं में, उसके विकास की सभी अवस्थाओं में किया जाता है। कच्चे फलों की कई उत्पादों जैसे शर्बत, शीरा, जैम, जेली आदि बनाने के लिए भी किया जाता है। आम-गरी अच्छी गुणवत्ता वाली वसा भी रहती है, जिसका उपयोग साबुन बनाने के लिए और मिठाई तैयार करने के लिए कोको –मक्खन के बदले में किया जाता है।

आम के खेती की संभावनाएं और उसका राष्ट्रीय महत्व

फलों के अंतर्गत आने वाला कुल क्षेत्र 36 प्रतिशत है जिसमें से 22.97 लाख हेक्टेयर पर आम की खेती की जाती है। आम की खेती उत्तर प्रदेश और आन्ध्र प्रदेश में बड़े पैमाने पर होती है। आम की खेती के कुल क्षेत्र में उक्त दोनों राज्यों में प्रत्येक का हिस्सा 23% है। इन दोनों राज्यों के बाद, कर्नाटक, बिहार, गुजरात और तमिलनाडू में भी आम की काफी मात्रा में खेती की जाती है।

भारत से निर्यात किए जाने वाले कृषि उत्पादों में ताजा आम और आम-गुदा मुख्य चीजें हैं। भारत से आम मुख्यत: यू. ए. ई. बंग्लादेश, यू. के., सऊदी अरब, नेपाल कुवैत, यू. एस. ए., और अन्य मध्य – पूर्व देशों को निर्यात किया जाता है। यूरोप के बाजार के लिए भी सीमित मात्रा में आम का निर्यात किया जाता है। दुनिया के आम उत्पादकों में से लगभग 45% का उत्पादन भारत में ही होता है और इस प्रकार यह विश्व का बड़ा आम उत्पादक है। ताजा फल का निर्यात आल्फोंसो और दशहरी किस्मों तक ही सीमित हैं। विश्व के आम बाजार में भारत का हिस्सा लगभग 15 प्रतिशत है। हमारे देश के कुल फल निर्यातों में आम का हिस्सा 40 प्रतिशत है। देश में आम की खेती के क्षेत्र और उत्पादक को बढ़ाने के लिए अच्छी गूंजाइश है।

आम की खेती की तकनीकी अपेक्षाएं

जलवायु

आम को उष्णकटिबंधीय और उष्णीय जलवायु में समुद्र तल से से 1400 मीटर ऊँचाई तक उगाया जा सकता है, बशर्ते की पुष्पन अवधि के दौरान उच्च आर्द्रता, वर्षा या सर्दी न हों, आम की खेती के लिए वे जगहें आदर्श हैं जहाँ अच्छी वर्षा और सूखी गर्मी रहती हैं। उन क्षेत्रों से बचकर रहना बेहतर है जहाँ हवाएँ और चक्रवात आते रहते हैं। जो पुष्प और फल के झड़ने के और शाखाओं के टूटने के कारक बन सकते हैं।

मिट्टी

आम को कई प्रकार की मिट्टी में यानी कछारी से लेकर मखरला तक में उगाया जा सकता है, बशर्ते कि वह गहरी और अच्छी जल- निकासी प्रणाली से युक्त हो। उसके लिए किंचित अम्लीय मिट्टी अच्छी है।

उप जातियाँ (किस्में)

हालाँकि भारत में आम की लगभग 1000 किस्में हैं, केवल निम्नलिखित किस्में जी विभिन्न राज्यों में उगायी जाती हैं। अलफोंसो, बंगलोरा, बंगनपल्ली , बोम्बाई, बोम्बे ग्रीन, दशेहरी, फजली, फेर्नाडीन, हिमसागर, केसर, किशन भोग, लंग्रा, मानखुर्द, मल्गोवा, नीलम, सामरबेहिस्ट, चौसा, सुवर्णरेखा, वनराज और जर्दालू।

हाल ही में आम की कुछ संकर – किस्में विमोचन विभिन्न संस्थाओं/ vishwavविश्वविद्यालयों द्वारा खेती के लिए विमोचित की गई है। ऐसी प्रजातियों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है।

मल्लिका – यह नीलम और दशहरी के बीच संकर है। फल मध्यम आकार, अरगजी रंग और अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं। कहा जाता कि इसके फसल काफी अच्छी होती है।

आम्रपाली – यह द्शेहरी और नीलम के बीच संकर है। यह बौना और हट्टा-कट्टा प्रकार का है और नियमित रूप से व देर से फलने वाली किस्म है। यह औसतन प्रति हेक्टेयर 16 टन उपज देती है और एक हेक्टेयर में 1600 पौधे उगाए जा सकते हैं।

मंगीरा

यह रूमानी और नीलम के बीच संकर है। यह अर्द्ध –हट्टा-कट्टा प्रकार का है और नियमित रूप से फलने वाली है। फल माध्यम आकार के होते हैं, छिलके का रंग हल्का पीला है, गुदा सख्त और रेशा- रहित है। यह स्वाद में मीठा है।

रत्ना

यह नीलम और अलफोंसो के बीच संकर है। यह नियमित रूप से फलनेवाली है और स्पंजी ऊतक से मुक्त है। फल माध्यम आकार के होते हैं और उच्च गुणवत्ता वाले हैं। गूदादृढ और रेशा रहित है, रंग गहन नारंगी है और उसका टी. एस. एस. भी अधिक है।

अर्का अरूणा

यह बंगनपल्ली और अलफोंसो के बीच संकर है। यह नियमित रूप से फलने वाली है और ऊँचाई में बौना है। प्रति हेक्टेयर 400 पौधे उगाये जा सकते हैं। फल बड़े आकार (500-700ग्राम) के होते हैं और छिलके का रंग आकर्षक होता है। गुदा रेशा-रहित है। फल स्वाद में मीठा है गुदा प्रतिशत 73 है और फल स्पंजी ऊतक से मुक्त है।

अर्का पुनीत

यह अलफोंसो और बंगन पल्ली के बीच का नियमित रूप से फ्ल्नेअला उर्वर संकर है। फल मध्यम आकार (220-250 ग्राम) के होते हैं और लाल रंग से युक्त छिलका आकर्षक रहता है। गुदा प्रतिशत 70 होने के कारण रेशा-रहित रहता है। फल स्वाद में मीठे हैं और कई दिन तक यह मीठापन रहता है। ये फल स्पंजी – ऊतक से मुक्त हैं। यह प्रसंस्करण के लिए भी अच्छी किस्म है।

अर्का अनमोल

यह अलफोंसो और जनार्धन पसंद के बीच का अर्ध – हट्टा- बट्टा

पौधा किस्म का संकर है। यह भी नियमित रूप से फलने वाली और स्पंजी- ऊतक से मुक्त उप-जाति है। पकने पर फल एक सामान पीला दिखता है। कई दिन तक यह फल खराब नहीं होता और निर्यात के लिए उपयुक्त है। इसमें शक्कर और अम्ल का अच्छा मिश्रण है। फल का वजन औसतन 300 ग्राम रहता है। गूदे का रंग नारंगी है।

प्रजनन

किसानों को हमेशा कायिक प्रवर्धित असली किस्म के पौधे मान्यता – प्राप्त पौध घरों से लेना चाहिए। थेंटकलम बांधना, कलम रोपना, बगली कलम लगाना एवं एपिकोटिल ग्राफ्टिंग आम में प्रजनन की लोकप्रिय रीतियाँ हैं।

रोपण

जमीन को गहरे जोतना चाहिए और इसके उपरांत पटरा चलाकर उसको समतल करना चाहिए और अच्छे जल- निकास हेतु हल्की ढाल रखनी चाहिए। रोपण की दूरी में क्षेत्र के आधार पर भिन्नता 10 एम. X10 एम. से 12एम X 12 एम रहती है। सूखे क्षेत्रों, में जहाँ वर्धन कम है, यह दूरी 10एम X 10 एम रहती है जबकि उच्च वर्षा और उर्वरा मिट्टी के क्षेत्रों में, जहाँ अधिक कायिक वृद्धि होती है, यह 12एम X 12 एम रहती है। आम्रपाली जैसी नई बौना संकर उप- जातियाँ 5एम X 5एम की कम दूरी में उगायी जा सकती हैं। मूल मिट्टी को अच्छी तरह गले हुए 20-25 कि.ग्राम. एफ.एम्.वाई., 2.5 कि.ग्राम. singसिंगल सुपर फास्फेट और 1 कि ग्रा. पोटाश के म्यूरिटी से मिलकर उससे गड्ढे भरे जाते हैं।

एक वर्ष पुरानी, स्वस्थ और सीधा उगनेवाली कलम विश्वनीय स्रोतों से ली जा सकती हैं और उन्हें गड्ढों के केंद्र में उनके भू-खंड सहित रोपा जा सकता है। इनका रोपण वर्षा ऋतु में इस प्रकार से किया जाना चाहिए कि इनकी जड़ों का विस्तार न जो और कलम- संयोजन जमीन स्तर से ऊपर हो। रोपण के तुरंत बाद पौधों की सिंचाई की जानी चाहिए। प्रारंभिक एक या दो वर्षों में उन्हें छाया उपलब्ध कराना और सीधा उगने में मदद करने के लिए खूँटे से बांधना उपयुक्त होगा।

पौधे को एक दिशा में बढ़ाना और उसकी काट-छांट

तल से एक मीटर तक मुख्य कांड को डालियों से मुक्त रखना चाहिए और उसके बाद डालियाँ ऐसा विभिन्न दिशाओं में उगने के लिए प्रबंध करने चाहिए जिससे तने में 20-25 सेंमी की दूरी में डालियाँ हो। एक दुसरे से पार करने वाली/रगड़ने वाली डालियाँ को निकालना चाहिए।

उर्वरक का उपयोग

सामान्यतया, पौधों की 1 से लेकर दस वर्ष की अवस्था तक प्रति पौधा प्रति वर्ष 170 ग्राम. यूरिया, 110 ग्राम सिंगिल सुपर फास्फेट और 115 ग्राम पोटाश का म्यूरियेट और उसके बाद 1.7 किग्रा. 1.1.किग्रा. दो समान यात्राओं में (जून-जुलाई और अक्टूबर) दिया जा सकता है। 3% यूरिया का पर्णीय छिडकाव रेतीले क्षेत्रों में पुष्पण से पहले उपयुक्त है।

सिंचाई

छोटे पौधों को जल्दी-जल्दी सींचा जाता है ताकि वे मजबूती से अपनी जड़ें जमा सकें। विकसित पेड़ों के मामले में उन पर फल लगने से लेकर उनके पकने तक 10 से 15 दिन के अन्तराल में सिंचाई करना लाभप्रद होता है। ऐसा करने से उनकी उपज बढ़ जाती है। तथापि, पेड़ों पर फूल लगने से 2-3 माह पूर्व उन्हें सींचना ठीक नहीं रहता क्योंकि ऐसा करने से फूलों की बजाय उन पर वनस्पति उगने की संभवना जो जाती है।

अंतर-फसलन

संबंध क्षेत्र की कृषि- जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए, आमों के बीच-बीच सब्जियाँ, फलिया, छोटी अवधि की बौनी फल फसलें जैस पपीता, अमरुद, आलूचा, आलूबुखारा आदि जैसी अंतर-फसलें उगाई जा सकती हैं। इन अंतर फसलों की जल तथा पोषक तत्वों की जरूरतें अलग से पूरी की जानी चाहिए।

पौधों का संरक्षण

आम के पौधों को विभिन्न प्रकार के कीड़े लगने तथा बीमारियों होने की संभावना रहती है। इनके नियंत्रण हेतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपाय निम्नलिखित हैं-

मैगों हॉपर : पुष्प गुच्छ लगते समय तथा फलों के मटर के दाने जितना आकार होने के समय दो बार कार्बारिल (0.15%), मोनोक्रोटोफास (0.04%) या फॉसफैमिडन (0.05%) आदि कीटनाशकों का छिड़काव किया जाना चाहिए।

मीली बग : नवंबर में अंतर-स्थान बनाना और हर वृक्ष के तने के पास 2% मिथाइल पैरेथियन बुरकना और जनवरी में तने के आस पास 20 सेंटीमीटर चौड़े 400 गेज पॉलीथीन स्ट्रिप लगाते हुए उनके निचले किनारों पर ग्रीज लगाने और हर 15 दिन के अन्तराल पर मोनोक्रोटोफास (0.04%) को दो बार स्प्रे जैसे रोगनिरोधी उपाय किये जाने चाहिए।

पाऊडरी मिल्ड्यू : सल्फर या काराथन का छिड़काव 10 – 15 दिन के अन्तराल पर दो या तीन बार किया जाना चाहिए।

एन्थ्रेक्नोज : हर 15 दिन के अन्तराल पर बेविस्टीन (0.1%) के दो स्प्रे करना।

मैलाफौर्मेशन : अक्टूबर में 200 पीपीएम एनएए का एक बार छिड़काव किया जाना चाहिए और उसके बाद दिसंबर-जनवरी में कलियाँ फूटने पर फूल तोड़े जाने चाहिए।

फलों का गिरना : फलों के विकसित होने के समय नियमित रूप से सिंचाई तथा कीटों और बीमारियों की समय पर प्रभावी तरीके से रोकथाम के उपाय करना तथा फलों के मटर के दाने के आकार का हो जाने पर 20 पीपीएम एनएए का छिड़काव करना।

फसलों की कटाई तथा उपज : 3 से 4 वर्ष की आयु की कलमी पौधे 10 से 20 फल देने शुरू कर देते हैं और 10 से 15वें वर्ष तक पहुंचते पहुंचते इष्टतम फसल आने लगती है जोकि सुचारू प्रबंधन किए जाने पर 40 वर्ष की आयु तक बढ़ती रहती है।

फसलोत्तर प्रबंधन

भंडारण

आमों की शैल्फ लाइफ छोटी होने के कारण यथा शीघ्र उन्हें ठंडा करके 13 सेंटीग्रेड के तापमान पर उनका भण्डारण कर दिया जाता है। आम की कुछ किस्में 10 डिग्री सेंटीग्रेड का तापमान भी झेल लेती है। फसलोत्तर प्रबंधन की प्रक्रिया में बहुत से चरण आते हैं जैसे फसलोत्तर प्रबंधन की तैयारी, श्रेणीकरण, धुलाई, सुखाई, वैक्सिंग, पैंकिंग, प्री- कूलिंग, समतल में उन्हें सुव्यवस्थित करके जमाना तथा उन्हें यातायात के साधन से एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजना आदि।

पैकिजिंग : आम तौर पर आमों की पैकिंग 40 सेंटीमीटर X 30 सेंटीमीटर X 20 सेंटीमीटर आकार के नालीदार फाइबर बोर्ड के बक्सों में की जाती है। हर कार्टन में एक तह में 8 से 10 पपैक किए जाते हैं। बक्सों में पर्याप्त संख्या में छेद (सतह के लगभग 8 प्रतिशत)होने चाहिए ताकि हवा आसानी से अंदर आ जा सके।

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