केर,सांगरी, गूंदे, काचरी, ग्वार की फली आदि उपज किसानों के लिए किसी जमाने में महज आजीविका का साधन थी। अब सीधे किसानों के लिए व्यापार का जरिया बनती जा रही हंै। ये नकदी फसलें किसानों के लिए व्यापार का रास्ता खोल चुकी हैं। इन नगदी फसलों को सूखी सब्जी या सूखा साग नाम से भी जाना जाता है। सूखी सब्जी दक्षिण भारत से लेकर उत्तर भारत तक अपनी विशेष पहचान है। अब नागौर के कई किसान इस व्यापार से जुड़ते जा रहे हैं।
पहले200 रूपए में बैग भर देते अब खुद करते हैं व्यापार : नागौरजिले भेड गांव के कैलाश विश्नोई पहले गांव में खेतों में लगी सांगरी, केर काचरी तोड़कर सीधे बैग भरते और बाजार में 200 या 300 रुपए में ले जाकर बेच देते थे। अब कई किसान खुद व्यापार करने लगे हैं। कैलाश हैदराबाद गए तो पता चला कि नागौर में 300 रुपए किलो तक बिकने वाली सांगरी वहां 500 से 600 रुपए किलो तक बिक रही है। इसको उन्होंने व्यापार बना लिया। सथेरण के बीरमाराम ने बताया कि नागौर के बाजार में सूखी सब्जी का व्यापार अच्छा रोजगार दे रहा है।
स्वाद में बेहतर | नागौरजिले के साथ ही पाली, जालोर, शेखावाटी, जोधपुर, बाड़मेर सहित कई जिलों के किसान केर, सांगरी, ग्वार की फली, काचरी सहित अन्य सब्जियों को बारिश के सीजन में तोड़कर इसे हल्के गर्म पानी में डालकर सुखाकर एकत्रित करते हैं। इसे बड़े व्यापारियों को बेचकर अच्छा मुनाफा कमाते हैं। गौरतलब है कि यह प्राकृतिक रूप से उपजी सब्जियां है जिसमें किसी भी प्रकार का पेस्टीसाइड रासायनिक खाद नहीं होता है और स्वाद में भी बेहत्तर होती है। खेती के साथ ही लघु व्यापार का मौका मिल गया है।
