उटा राजकीय विश्वविद्यालय के अनुसार, 2.5-5 सेमी पानी (प्रति सप्ताह 1-2 इंच) डालना, बैंगन के लिए उचित सिंचाई योजना है। जाहिर तौर पर, अलग-अलग मौसम और मिट्टी की परिस्थिति के आधार पर पानी की जरूरतें बिल्कुल अलग हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, चिकनी मिट्टी के लिए आमतौर पर रेतीली मिट्टी की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, वातावरण में ज्यादा नमी होने पर या बारिश के दिनों में सिंचाई की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं हो सकती है। दूसरी ओर, बहुत ज्यादा तापमान वाला सूखा दिन होने पर एक से ज्यादा बार सिंचाई करने की जरूरत पड़ सकती है। अलग-अलग बैंगन की किस्मों के लिए अलग-अलग पानी की जरूरतें होती हैं।
सामान्य नियम के अनुसार, परागण से फल लगने तक पौधे की पानी की जरूरतें बढ़ती हैं। भूमध्यसागरीय देशों में कई किसान, शुरूआती चरणों के दौरान, हर 2-3 दिन पर प्रत्येक पौधे में 1 लीटर पानी से सिंचाई करना पसंद करते हैं। फल आने के चरणों के दौरान और जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है (>35 °C), वो सिंचाई सत्र बढ़ा देते हैं क्योंकि इन चरणों पर पौधों को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत होती है। इस चरण पर, मौसम की स्थितियों के आधार पर वो हर दिन, या दिन में दो बार भी सिंचाई कर सकते हैं। गर्म अवधियों के दौरान, बादल वाला दिन होने पर वो सुबह-सुबह अपने बैंगन के पौधों की सिंचाई करते हैं, और रात में एक और बार सिंचाई करते हैं। पत्तियों को पानी देने को बीमारियों के प्रकोप से जोड़ा गया है। सामान्य तौर पर, विशेष रूप से पत्तियों पर, ज्यादा नमी से बीमारियां फैल सकती हैं। दूसरी ओर, पानी की कमी के कारण पौधे रोगों के लिए अतिसंवेदनशील हो जाते हैं।
इसके लिए आमतौर पर ड्रिप सिंचाई प्रणाली का प्रयोग किया जाता है। ज्यादातर किसान कई या एक बार प्रयोग होने वाले ड्रिप स्ट्रिप का प्रयोग करके हैं, जहाँ ड्रिप के बीच 20 सेमी (7.8 इंच) की दूरी होती है।
बैंगन का परागण
बैंगन स्व-परागण वाला पौधा है। लेकिन, ऐसा बताया गया है कि मधुमक्खियां परागण को बेहतर बना सकती हैं, और इससे फल लगने और प्रति हेक्टेयर कुछ उपज में भी सुधार होता है।
